अजीब खिड़की है।


जितनी क्लैरिटी बचपन में ऐस्ट्रॉनॉट बनने की थी, अगर उसकी एक चौथाई भी अब मिल जाए तो शायद यूँ हर रोज़ पोस्ट ना लिखना पड़े।

सब दौड़ रहे है इधर से उधर, ना जाने क्या खोज रहे है। २०१८ है भाई, भागेंगे नहीं तो ख़ुद से ही पीछे छूट जाएँगे। भाइसाहब! आपका छाता गिर गया है। ओह थैंक यू, जल्दी में था तो बैग की चैन बंद करनी भूल गया। अरे ऐसी भी क्या जल्दी भाई, बारिश से तेज़ भागने का इरादा तो नहीं बना लिए हो ना?  हाहा, नहीं। थैंक्स।

मुंबई आने के दो साल बाद पता चला की यहाँ रेस दूसरों से नहीं, ख़ुद से है। पहले पता होता तो शायद मैसूर में इनफ़ोसिस ही जॉन कर लेता। दो कोड लिख के दिन तो ख़त्म हो जाता। कम से कम हर शाम दिमाग़ तो नहीं दौड़ाना पड़ता। आधा दिन तो इसी असमंजस में निकाल जाता है की आज क्या पढ़ूँ, क्या लिखूँ, क्या सुनूँ , क्या करूँ। और फिर सोचता हूँ, छोड़ो ये सब, इंडिया इंग्लंड की सिरीज़ चल रही है, वो देख लेता हूँ। कोहली दो गाली देगा तो शायद मेरा जी भी करेगा कुछ करने को। तीसरा सेशन आने को है, पर अभी तक जी नहीं किया है। चलो डे टू में करता है या नहीं, कल देखते है। कभी कभी लगता है ये बस ऐंज़ाइयटी है, पर फिर सोचता हूँ, अगर कुछ ना करने से ऐंज़ाइयटी हो रही है तो अगर कुछ कर लूँगा तो क्या होगा। वो जो इंटर्व्यू में पूछते है ना कि पाँच साल बाद अपने आप को कहाँ देखते हो, अगर उसका जवाब कभी सीरीयस होकर सोच लिया होता तो आज शायद अपने आप को वहीं देखता।

मेरे कमरे में खिड़की नहीं है। विंडो एसी लगवाने के लिए सारी खिड़कियाँ ऐसी बंद करवायी की अब खोलने के लिए भी कार्पेंटर को बुलवाना पड़ेगा। दो साल से तो बुलाया नहीं है, आगे भी शायद यूँही टालता रहूँगा। आख़िर काम टालना ही तो हर लेखक का सर्वश्रेष्ठ गुण होता है। लेखक बनूँ या ना बनूँ पर ये आदत ज़रूर डाल ली है टालने कि। हवा, बारिश, रोशनी, ये सब कुछ मेरे कमरे से नहीं आते। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि जब पहली बार घर में घुसा था, तब से आज तक वही हवा को रीसाइकल  कर कर के साँस ले रहा हूँ। बम्बई की चकाचौंध मेरी खिड़की से बाहर ही रहे तो बढ़िया। घर बदलने का तो सवाल ही नहीं उठता। बड़ी मुश्किल से ये वाला मिला है, ये भी अगर खिड़की के लिए छोड़ दिया तो कही सड़कों पर ही ना सोना पड़ जाए। भर के हवा बारिश मिलेगी। अति हर चीज़ की बुरी होती है।

शाम को ऑफ़िस से लौटते वक़्त ट्रेन से आता हूँ। रात ११ बजे वैसे भी भीड़ कम होती है तो फ़र्स्ट क्लास के डब्बे में एक कोना पकड़ के अपना किंडल निकाल के पढ़ने लगता हूँ। कभी कभी तो वो बीस मिनट की यात्रा ही मेरे दिन का हाइलायट होती है। ट्रेन में खिड़की भी होती है, हवा भी, और कभी कभी बारिश की बूँदें भी। हज़ारों लोग थके हारे शायद अपने बंद खिड़की वाले कमरे की और जा रहे है, ये सोच के थोड़ा सुकून भी मिलता है की मैं अकेला नहीं हूँ, और दुःख भी होता है की मैं भी इस भीड़ का एक हिस्सा हूँ। दो साल महीने हो जाएँगे बम्बई आए। नम्बर सिग्निफ़िकंट तो नहीं है पर बड़ा ज़रूर है। ये सोच के ही अजीब सा लगता है।

ट्रेन से उतर के बैग चेक कर लेता हूँ, कही ये लैप्टॉप चोरी हो गया तो एक और ईमआइ बढ़ जाएगी। जब से इस शहर में आया हूँ, साँस लेने के अलावा हर चीज़ की ईमआइ भरी है। चोर का भी क्या दोष, शायद वो भी राइटर या ऐक्टर बनने आया हो, और  लैप्टॉप ख़रीदने के पैसे नहीं होगे। मोरल्स किसके कमज़ोर नहीं होते। और जिसके नहीं होते, ये शहर कमज़ोर कर देता है। बड़े से बड़ा लेखक या तो टीवी के ख़राब सीरीयल्ज़ के लिए लिखता है या फिर किसी ख़राब निम्न बिंदु वाली साइट पे पेट पालने की कोशिश कर रहा होता है। जिसे ये भी नहीं मिलता वो शायद चोर बन जाता होगा। किसे क्या ही पता। हमने कौनसी किसी चोर से कभी बात की है। दस बारह मिनट ट्रेन से उतर के चलता हूँ तो वो खिड़की दिखाई पड़ती है अपने कमरे की। बाहर से ऐसा लगता है कि अंदर कोई घुट सा रहा है। और जब अंदर जाकर देखता हूँ तो ऐसा लगता है कि खिड़की के बाहर सब घुट से रहे है। अजीब खिड़की है।

समंदर के बारे में बहुत से लोग लिखते है, और ऐसा कुछ बचा भी नहीं है की जो ना लिखा गया हो। दिन में सब साइड से निकल जाते है बेचारे के और रात में उसे ही देखने के लिए घंटो कार्टर रोड पे बैठे रहते है। मुझे वो लोग समझ नहीं आते जिन्हें समंदर से इंस्पीरेशन आती है। एक बंद खिड़की ने ऐसा क्या बिगाड़ दिया तुम्हारा जो तुम समंदर के पास जा रहे हो। पर मैं फिर भी चला जाता हूँ कभी कभी समंदर से मिलने, पाँच मिनट से ज़्यादा आज तक नहीं बैठ पाया। समंदर को देख ही नहीं पाता, बस उन लोगों को देखता हूँ जो इसे निहारते रहते है। एक बेचारा समंदर कितने लोगों को इन्स्पाइअर करेगा। उस पे रहम खा के चल देता हूँ। हमारी खिड़की ही काफ़ी है और ख़ैर अगर इंस्पीरेशन से दुनिया चलती तो आज समंदर पे कोई नहीं बैठता। वो भी लोगों का काटे जा रहा है और लोग भी कटवाए जा रहे है।

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2 thoughts on “अजीब खिड़की है।

  1. I am following your blog for around 4 years and whenever I feel depressed I read your posts, there is something so relatable that it motivates and inspires me. This blog is the best thing happened to me. Please keep writing. I like reading in hindi, so loved these last 2 Manto inspired writing style too!!

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