कुछ हिंदी में लिखा है


ज़माने के जिस दौर से हम गुज़र रहे हैं, अगर आप उससे वाकिफ़ नहीं हैं तो मेरे अफसाने पढ़िये और अगर आप इन अफसानों को बरदाश्त नहीं कर सकते तो इसका मतलब है कि ज़माना नाक़ाबिलेबरदाश्त है। मेरी तहरीर(लेखन) में कोई नुक़्स नहीं जिस नुक़्स को मेरे नाम से मनसूब किया जाता है, वह दरअसल मौजूदा निज़ाम का एक नुक़्स है। मैं हंगामापसन्द नहीं हूं और लोगों के ख्यालात में हैज़ान पैदा करना नहीं चाहता। मैं तहज़ीब, तमद्दुन, और सोसाइटी की चोली क्या उतारुंगा, जो है ही नंगी। मैं उसे कपड़े पहनाने की कोशिश भी नहीं करता, क्योंकि यह मेरा काम नहीं, दर्ज़ियों का काम है

सआदत हसन मंटो

पहली बार हिंदी में कुछ लिखने की कोशिश कर रहा हूँ। कुछ ग़लती हो तो माफ़ करना। कल मंटो साहब को हिंदी में पढ़ा। तो आज मंटो साहब बनने का मन कर गया। हिंदी मेरी पहली भाषा ज़रूर है, पर मेरी तालीम, मेरे विचार, सब अंग्रेज़ी है। तालीम! ये शब्द सुना बहुत सी फ़िल्मों में है, पर इस्तेमाल आज पहली बार कर रहा हूँ। थोड़ा शो ऑफ़ तो चलता है।अब शो ऑफ़ की हिंदी मत पूछ लीजिएगा।

किताबें अक्सर एक छाप छोड़ जाती है। आज अगर मैं रूश्दी साहब की कोई किताब पढ़ूँगा, तो अगले दो दिन मैं रूश्दी साहब जैसा लिखने कि कोशिश करूँगा।अगर मेरे किसी ट्वीट में आप मुझे mixing की जगह commingling इस्तेमाल करता हुआ देखें तो समझ लीजिएगा की Midnight’s Children का पहला पन्ना पढ़ कर आया हूँ। हालाँकि पढ़ने का शौक़ मुझे बचपन से था, पर दसवीं तक मैंने ज़्यादा कुछ पढ़ा नहीं। कोर्स की किताबें ही नॉवल समझ के पढ़ लेता था। माँ को लगता था कि नॉवल वगरह पढ़ने से अच्छा सोशल स्टडीज़ के दो चैप्टर का रट्टा लगा लूँ।और उनकी भी कोई ग़लती नहीं है, हमारे समाज के बहुत से परिवारों में ये सोच आज भी चौखट में रखी लालटेन कि तरह जगमगा रही है। बूझने का नाम ही नहीं ले रही। साहित्य, आर्ट, नावल्ज़, ये सब अमीर लोगों के चोंचले है, असली शिक्षा तो गणित की किताब देती है। और देती भी है, बात ग़लत नहीं है।पर ज़िन्दगी के बारे में जितना आपको एक Camus या Fitzgerald बताएगा, RS Agarwal शायद ही उतना बता पाए। मुझे भी इसकी समझ दसवीं के बाद ही आयी।देर तो नहीं हुई थी पर हाँ थोड़ा पीछे ज़रूर छूट गया था। अगले दो साल तो engineering में घुसने के लिए ही बर्बाद कर दिए। ग्यारहवी बारवी मुझे याद ही नहीं। स्कूल जाओ, कोचिंग जाओ, सेल्फ़ स्टडी, एक छुट्टी मिल गयी अगर बाई चान्स, तो उस दिन घर पे बैठ के किसी नॉवल के तीन चैप्टर पढ़ लो। उससे ज़्यादा अगर पढ़ लेता था तो ख़ुद ही को गिल्ट होता था ओर्गानिक केमिस्ट्री ना पढ़ने का। इतना पैसा ख़र्च दिया tuition में, फिर भी ये साली केमिस्ट्री समझ क्यूँ नहीं आती।

जैसे तैसे करके एक engineering कॉलेज में घुसने के बाद पता लगा की सब साला फ़्रॉड है। ये कोडिंग तो हमने बारवी में ही सीख ली थी, ये चार साल सिखा के इतना टाइम काहे वेस्ट कर रहे है। पर इंडिया में एजुकेशन से बड़ा धंधा बस पॉलिटिक्स है। तो भर दी फ़ीस चार साल एक डिग्री लेने के लिए, जो आज भी किसी दोस्त के यहाँ पड़ी है। देखने का मन ही नहीं करता। क्यूँकि कुछ सीखा ही नहीं। हाँ, किताबों का शौक़ ख़ूब पूरा किया। पॉकेट मनी से ५०० रुपए हर महीने निकाल के तीन चार किताबें ख़रीदता था और उन्हें पढ़ के बेच देता था। कुछ जो बहुत ही पसंद आ जाती थी उन्हें संभाल के रख लेता था। फिर किसीने नई सड़क का पता दिया तो वहाँ जाके पता लगा सौ रुपए में दस किताबें मिल रही है। अगले तीन चार हफ़्तों में दो बोरी किताबें ले आया। मज़दूर जैसे। ख़ूब पढ़ा। फिर उन्ही की तरह लिखना शुरू कर दिया। जिस राइटर को पढ़ता, अगले दो हफ़्ते वही राइटर बनना चाहता था। Dickens से लेके Dostoevsky, सब। ये अठारह लाइन लम्बा सेंटेन्स Dickens कैसे लिख लेता था आज भी समझ नहीं आता। पर कोशिशें जारी थी हमारी भी। समेस्टर के हर पेपर में जो सवाल नहीं आता था उसमें Tale of Two Cities का कुछ हिस्सा अपने मन से बना के लिख आता था। “It was the best P type semi conductor, it was the worst N type semi conductor, it was the age of transistors, it was the age of resistors, it was the signal processing” वगरह वगरह, और माशाल्लाह टीचर भी पूरे नम्बर दे देता था। Engineering कॉलेज में पेपर चेक करने का दस रुपया मिलता है, ख़ुद गांधी जी भी होते तो बिना पढ़े ही चेक करते।

धीरे धीरे करके ऐसे ही लिखना शुरू किया। सब लेखकों से थोड़ी थोड़ी चुरा कर अपनी एक ख़ुद की आवाज़ बनायी। ब्लॉग लिखे, दूसरों के लिए लिखा, स्केच लिखे, बड़े बड़े लोगों से बहुत कुछ सीखा राइटिंग के बारे में, थोड़ा बहुत समझ भी आ गया, नयी नयी किताबें पढ़ी, और जारी है कोशिश अभी भी। आठ साल से लिख ही रहा हूँ। आगे भी शायद यही है।

तो क्या बात कर रहा था मैं, हाँ, कल मंटो पढ़ा। उर्दू से हिंदी ट्रैन्स्लेशन  था। बहुत सालों बाद कुछ हिंदी में पढ़ा तो लगा हिंदी में कुछ लिखा जाए। कम्फ़र्ट ज़ोन से बाहर जाकर। थोड़ा मंटो बना जाए।

शो ऑफ़ की हिंदी दिखावा होती है। अब याद आया। कोई नहीं।

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