The Government Is Sending 3 Tailors To Stitch Up The Hole In The Ozone Layer


Note: This article was written two years ago for Huffington Post. (Un)Fortunately, it’s still valid.

After reading about the pollution status of some areas in Delhi on Diwali eve, the government of India took a historic step in the direction of cleaning the environment and decided to send three tailors—Ramesh, Suresh and Michael— to the ozone layer to stitch up the much-talked-about hole. Now, we’ve read about the hole in the ozone layer (let’s call it ozole for short) due to emissions of greenhouse gas since what seems like the beginning of time. However, after the invention of scientists in India and also of Twitter, the cause of the ozole has been attributed to Indians bursting crackers during Diwali.

Now, a debate around this topic has been raging since the time Lord Rama came to Ayodhya after vanvaas. When the arrows of Lord Rama and Ravana collided, it created huge sparks and therefore, pollution. The liberals of that time predicted a hole in the ozone layer but rescuing Sita was apparently more important than saving the environment. However, due to technological advancements, these debates are happening much more frequently nowadays. The liberals and rational people (mostly seen online) demand a ban on crackers almost every year, although they are looked down upon by 90% of the population in India who also identify themselves as right wing nationalists. The right wing guys win the online debate by a huge margin because there is no appropriate retort to the argument, “What about Bakr Id? They should first stop killing bakras.” The right wing guys, who often confuse themselves as real nationalistic heroes, think that goats and crackers are the same and so is the killing of animals and air pollution. As much as rational people would like to argue with this, they’d much rather breathe the poisonous air for the rest of their lives.

After seeing the helplessness of the rational minority, the government of India took the decision to stitch up the ozone layer. A step that would make both the right wing and the liberals happy is seen as a masterstroke in the current political scenario. A minister was quoted as saying, “We want our kids to breathe fresh air while they play with fire the whole night, so this step of stitching up the ozone layer will be the perfect way to give them a safe environment, as well as to prove to the world, especially to UNESCO, that our environmental safety measures are the best in the world.” They certainly are, Mister Minister. The process of choosing the tailors, however, wasn’t an easy task. About 1250 nationalist tailors applied for the job and they had to go through rigorous exams and training to pass muster. The training included activities such as spamming liberals with messages such as “What about killing bakras during Eid?”, “Barkha Dutt wh***. Gaumutra best,” etc. to stitching the national flag while standing. Three lucky tailors were shortlisted after this to go on the mission of stitching up the ozone layer. Ramesh and Suresh are Hindu brothers and Michael is a Christian. Ramesh, who also designed the jacket with Modi’s name woven in it, was on cloud 9 after hearing the news of him being shortlisted for this project. However, we are pretty sure that he has to go much beyond cloud 9 to accomplish it. Till cloud 7654 maybe.

The opposition, like always, seemed to have a problem with this step too. The leader of the opposition, Mr. Rajmohan, was quoted as saying, “It’s all propaganda by the government. Agar wo ozone ka hole band kar denge toh pollution bahar kaise jaayega? Ye sab ek saajish hai (If we stitch up the hole how will the pollution go out? It is a conspiracy.) It’s Bhopal gas tragedy- 2.”

As much as the rest of the world is enjoying following this bizarre turn of events, the situation looks pretty tense down here in our country, especially in Delhi, where the pollution levels have increased to 42 times the acceptable limit. This could mean that either the machine with which we are measuring the pollution level is faulty or that our ability to comprehend the consequences of our own actions is rusted. The race of life against pollution has begun. On your mask, get set, die.

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अजीब खिड़की है।


जितनी क्लैरिटी बचपन में ऐस्ट्रॉनॉट बनने की थी, अगर उसकी एक चौथाई भी अब मिल जाए तो शायद यूँ हर रोज़ पोस्ट ना लिखना पड़े।

सब दौड़ रहे है इधर से उधर, ना जाने क्या खोज रहे है। २०१८ है भाई, भागेंगे नहीं तो ख़ुद से ही पीछे छूट जाएँगे। भाइसाहब! आपका छाता गिर गया है। ओह थैंक यू, जल्दी में था तो बैग की चैन बंद करनी भूल गया। अरे ऐसी भी क्या जल्दी भाई, बारिश से तेज़ भागने का इरादा तो नहीं बना लिए हो ना?  हाहा, नहीं। थैंक्स।

मुंबई आने के दो साल बाद पता चला की यहाँ रेस दूसरों से नहीं, ख़ुद से है। पहले पता होता तो शायद मैसूर में इनफ़ोसिस ही जॉन कर लेता। दो कोड लिख के दिन तो ख़त्म हो जाता। कम से कम हर शाम दिमाग़ तो नहीं दौड़ाना पड़ता। आधा दिन तो इसी असमंजस में निकाल जाता है की आज क्या पढ़ूँ, क्या लिखूँ, क्या सुनूँ , क्या करूँ। और फिर सोचता हूँ, छोड़ो ये सब, इंडिया इंग्लंड की सिरीज़ चल रही है, वो देख लेता हूँ। कोहली दो गाली देगा तो शायद मेरा जी भी करेगा कुछ करने को। तीसरा सेशन आने को है, पर अभी तक जी नहीं किया है। चलो डे टू में करता है या नहीं, कल देखते है। कभी कभी लगता है ये बस ऐंज़ाइयटी है, पर फिर सोचता हूँ, अगर कुछ ना करने से ऐंज़ाइयटी हो रही है तो अगर कुछ कर लूँगा तो क्या होगा। वो जो इंटर्व्यू में पूछते है ना कि पाँच साल बाद अपने आप को कहाँ देखते हो, अगर उसका जवाब कभी सीरीयस होकर सोच लिया होता तो आज शायद अपने आप को वहीं देखता।

मेरे कमरे में खिड़की नहीं है। विंडो एसी लगवाने के लिए सारी खिड़कियाँ ऐसी बंद करवायी की अब खोलने के लिए भी कार्पेंटर को बुलवाना पड़ेगा। दो साल से तो बुलाया नहीं है, आगे भी शायद यूँही टालता रहूँगा। आख़िर काम टालना ही तो हर लेखक का सर्वश्रेष्ठ गुण होता है। लेखक बनूँ या ना बनूँ पर ये आदत ज़रूर डाल ली है टालने कि। हवा, बारिश, रोशनी, ये सब कुछ मेरे कमरे से नहीं आते। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि जब पहली बार घर में घुसा था, तब से आज तक वही हवा को रीसाइकल  कर कर के साँस ले रहा हूँ। बम्बई की चकाचौंध मेरी खिड़की से बाहर ही रहे तो बढ़िया। घर बदलने का तो सवाल ही नहीं उठता। बड़ी मुश्किल से ये वाला मिला है, ये भी अगर खिड़की के लिए छोड़ दिया तो कही सड़कों पर ही ना सोना पड़ जाए। भर के हवा बारिश मिलेगी। अति हर चीज़ की बुरी होती है।

शाम को ऑफ़िस से लौटते वक़्त ट्रेन से आता हूँ। रात ११ बजे वैसे भी भीड़ कम होती है तो फ़र्स्ट क्लास के डब्बे में एक कोना पकड़ के अपना किंडल निकाल के पढ़ने लगता हूँ। कभी कभी तो वो बीस मिनट की यात्रा ही मेरे दिन का हाइलायट होती है। ट्रेन में खिड़की भी होती है, हवा भी, और कभी कभी बारिश की बूँदें भी। हज़ारों लोग थके हारे शायद अपने बंद खिड़की वाले कमरे की और जा रहे है, ये सोच के थोड़ा सुकून भी मिलता है की मैं अकेला नहीं हूँ, और दुःख भी होता है की मैं भी इस भीड़ का एक हिस्सा हूँ। दो साल महीने हो जाएँगे बम्बई आए। नम्बर सिग्निफ़िकंट तो नहीं है पर बड़ा ज़रूर है। ये सोच के ही अजीब सा लगता है।

ट्रेन से उतर के बैग चेक कर लेता हूँ, कही ये लैप्टॉप चोरी हो गया तो एक और ईमआइ बढ़ जाएगी। जब से इस शहर में आया हूँ, साँस लेने के अलावा हर चीज़ की ईमआइ भरी है। चोर का भी क्या दोष, शायद वो भी राइटर या ऐक्टर बनने आया हो, और  लैप्टॉप ख़रीदने के पैसे नहीं होगे। मोरल्स किसके कमज़ोर नहीं होते। और जिसके नहीं होते, ये शहर कमज़ोर कर देता है। बड़े से बड़ा लेखक या तो टीवी के ख़राब सीरीयल्ज़ के लिए लिखता है या फिर किसी ख़राब निम्न बिंदु वाली साइट पे पेट पालने की कोशिश कर रहा होता है। जिसे ये भी नहीं मिलता वो शायद चोर बन जाता होगा। किसे क्या ही पता। हमने कौनसी किसी चोर से कभी बात की है। दस बारह मिनट ट्रेन से उतर के चलता हूँ तो वो खिड़की दिखाई पड़ती है अपने कमरे की। बाहर से ऐसा लगता है कि अंदर कोई घुट सा रहा है। और जब अंदर जाकर देखता हूँ तो ऐसा लगता है कि खिड़की के बाहर सब घुट से रहे है। अजीब खिड़की है।

समंदर के बारे में बहुत से लोग लिखते है, और ऐसा कुछ बचा भी नहीं है की जो ना लिखा गया हो। दिन में सब साइड से निकल जाते है बेचारे के और रात में उसे ही देखने के लिए घंटो कार्टर रोड पे बैठे रहते है। मुझे वो लोग समझ नहीं आते जिन्हें समंदर से इंस्पीरेशन आती है। एक बंद खिड़की ने ऐसा क्या बिगाड़ दिया तुम्हारा जो तुम समंदर के पास जा रहे हो। पर मैं फिर भी चला जाता हूँ कभी कभी समंदर से मिलने, पाँच मिनट से ज़्यादा आज तक नहीं बैठ पाया। समंदर को देख ही नहीं पाता, बस उन लोगों को देखता हूँ जो इसे निहारते रहते है। एक बेचारा समंदर कितने लोगों को इन्स्पाइअर करेगा। उस पे रहम खा के चल देता हूँ। हमारी खिड़की ही काफ़ी है और ख़ैर अगर इंस्पीरेशन से दुनिया चलती तो आज समंदर पे कोई नहीं बैठता। वो भी लोगों का काटे जा रहा है और लोग भी कटवाए जा रहे है।

कुछ हिंदी में लिखा है


ज़माने के जिस दौर से हम गुज़र रहे हैं, अगर आप उससे वाकिफ़ नहीं हैं तो मेरे अफसाने पढ़िये और अगर आप इन अफसानों को बरदाश्त नहीं कर सकते तो इसका मतलब है कि ज़माना नाक़ाबिलेबरदाश्त है। मेरी तहरीर(लेखन) में कोई नुक़्स नहीं जिस नुक़्स को मेरे नाम से मनसूब किया जाता है, वह दरअसल मौजूदा निज़ाम का एक नुक़्स है। मैं हंगामापसन्द नहीं हूं और लोगों के ख्यालात में हैज़ान पैदा करना नहीं चाहता। मैं तहज़ीब, तमद्दुन, और सोसाइटी की चोली क्या उतारुंगा, जो है ही नंगी। मैं उसे कपड़े पहनाने की कोशिश भी नहीं करता, क्योंकि यह मेरा काम नहीं, दर्ज़ियों का काम है

सआदत हसन मंटो

पहली बार हिंदी में कुछ लिखने की कोशिश कर रहा हूँ। कुछ ग़लती हो तो माफ़ करना। कल मंटो साहब को हिंदी में पढ़ा। तो आज मंटो साहब बनने का मन कर गया। हिंदी मेरी पहली भाषा ज़रूर है, पर मेरी तालीम, मेरे विचार, सब अंग्रेज़ी है। तालीम! ये शब्द सुना बहुत सी फ़िल्मों में है, पर इस्तेमाल आज पहली बार कर रहा हूँ। थोड़ा शो ऑफ़ तो चलता है।अब शो ऑफ़ की हिंदी मत पूछ लीजिएगा।

किताबें अक्सर एक छाप छोड़ जाती है। आज अगर मैं रूश्दी साहब की कोई किताब पढ़ूँगा, तो अगले दो दिन मैं रूश्दी साहब जैसा लिखने कि कोशिश करूँगा।अगर मेरे किसी ट्वीट में आप मुझे mixing की जगह commingling इस्तेमाल करता हुआ देखें तो समझ लीजिएगा की Midnight’s Children का पहला पन्ना पढ़ कर आया हूँ। हालाँकि पढ़ने का शौक़ मुझे बचपन से था, पर दसवीं तक मैंने ज़्यादा कुछ पढ़ा नहीं। कोर्स की किताबें ही नॉवल समझ के पढ़ लेता था। माँ को लगता था कि नॉवल वगरह पढ़ने से अच्छा सोशल स्टडीज़ के दो चैप्टर का रट्टा लगा लूँ।और उनकी भी कोई ग़लती नहीं है, हमारे समाज के बहुत से परिवारों में ये सोच आज भी चौखट में रखी लालटेन कि तरह जगमगा रही है। बूझने का नाम ही नहीं ले रही। साहित्य, आर्ट, नावल्ज़, ये सब अमीर लोगों के चोंचले है, असली शिक्षा तो गणित की किताब देती है। और देती भी है, बात ग़लत नहीं है।पर ज़िन्दगी के बारे में जितना आपको एक Camus या Fitzgerald बताएगा, RS Agarwal शायद ही उतना बता पाए। मुझे भी इसकी समझ दसवीं के बाद ही आयी।देर तो नहीं हुई थी पर हाँ थोड़ा पीछे ज़रूर छूट गया था। अगले दो साल तो engineering में घुसने के लिए ही बर्बाद कर दिए। ग्यारहवी बारवी मुझे याद ही नहीं। स्कूल जाओ, कोचिंग जाओ, सेल्फ़ स्टडी, एक छुट्टी मिल गयी अगर बाई चान्स, तो उस दिन घर पे बैठ के किसी नॉवल के तीन चैप्टर पढ़ लो। उससे ज़्यादा अगर पढ़ लेता था तो ख़ुद ही को गिल्ट होता था ओर्गानिक केमिस्ट्री ना पढ़ने का। इतना पैसा ख़र्च दिया tuition में, फिर भी ये साली केमिस्ट्री समझ क्यूँ नहीं आती।

जैसे तैसे करके एक engineering कॉलेज में घुसने के बाद पता लगा की सब साला फ़्रॉड है। ये कोडिंग तो हमने बारवी में ही सीख ली थी, ये चार साल सिखा के इतना टाइम काहे वेस्ट कर रहे है। पर इंडिया में एजुकेशन से बड़ा धंधा बस पॉलिटिक्स है। तो भर दी फ़ीस चार साल एक डिग्री लेने के लिए, जो आज भी किसी दोस्त के यहाँ पड़ी है। देखने का मन ही नहीं करता। क्यूँकि कुछ सीखा ही नहीं। हाँ, किताबों का शौक़ ख़ूब पूरा किया। पॉकेट मनी से ५०० रुपए हर महीने निकाल के तीन चार किताबें ख़रीदता था और उन्हें पढ़ के बेच देता था। कुछ जो बहुत ही पसंद आ जाती थी उन्हें संभाल के रख लेता था। फिर किसीने नई सड़क का पता दिया तो वहाँ जाके पता लगा सौ रुपए में दस किताबें मिल रही है। अगले तीन चार हफ़्तों में दो बोरी किताबें ले आया। मज़दूर जैसे। ख़ूब पढ़ा। फिर उन्ही की तरह लिखना शुरू कर दिया। जिस राइटर को पढ़ता, अगले दो हफ़्ते वही राइटर बनना चाहता था। Dickens से लेके Dostoevsky, सब। ये अठारह लाइन लम्बा सेंटेन्स Dickens कैसे लिख लेता था आज भी समझ नहीं आता। पर कोशिशें जारी थी हमारी भी। समेस्टर के हर पेपर में जो सवाल नहीं आता था उसमें Tale of Two Cities का कुछ हिस्सा अपने मन से बना के लिख आता था। “It was the best P type semi conductor, it was the worst N type semi conductor, it was the age of transistors, it was the age of resistors, it was the signal processing” वगरह वगरह, और माशाल्लाह टीचर भी पूरे नम्बर दे देता था। Engineering कॉलेज में पेपर चेक करने का दस रुपया मिलता है, ख़ुद गांधी जी भी होते तो बिना पढ़े ही चेक करते।

धीरे धीरे करके ऐसे ही लिखना शुरू किया। सब लेखकों से थोड़ी थोड़ी चुरा कर अपनी एक ख़ुद की आवाज़ बनायी। ब्लॉग लिखे, दूसरों के लिए लिखा, स्केच लिखे, बड़े बड़े लोगों से बहुत कुछ सीखा राइटिंग के बारे में, थोड़ा बहुत समझ भी आ गया, नयी नयी किताबें पढ़ी, और जारी है कोशिश अभी भी। आठ साल से लिख ही रहा हूँ। आगे भी शायद यही है।

तो क्या बात कर रहा था मैं, हाँ, कल मंटो पढ़ा। उर्दू से हिंदी ट्रैन्स्लेशन  था। बहुत सालों बाद कुछ हिंदी में पढ़ा तो लगा हिंदी में कुछ लिखा जाए। कम्फ़र्ट ज़ोन से बाहर जाकर। थोड़ा मंटो बना जाए।

शो ऑफ़ की हिंदी दिखावा होती है। अब याद आया। कोई नहीं।

How can it not piss you off, man?


How can it not piss you off, man? You’re 28. Bjorn Borg retired when he was 26, after achieving every record in the book. Those Boston guys wrote and directed Good Will Hunting when they were your age. Were all of them prodigies? You gotta be a little pissed, man.

Greatness achieved, in any field, by any gender, at any place, pisses me off. It pisses me off so much that I wanna cry. I don’t mean it in any wrong way, no; it inspires me too, it inspires me very much, but the fact that they did it and I am sitting here sulking about my petty problems, pisses me off. The fact that the only aim of my life has been restricted to becoming the best amongst the mediocre, to being able to climb the ladder one step at a time, maybe two if it’s a good hair day, bugs me. No, I am not jealous of anyone making it big or finding new money with the mediocre talent. Not at all. You deserve it even if you are mediocre, because there will always be people who will look upto you. Look at our population, man. You can do shit and market it well, and you will be famous. But those guys, those guys at the top of the ladder (I am not sure if the metaphor of ladders even apply to them), those who have achieved greatness, I am so jealous of them.

How can you be jealous of them? Why are you comparing yourself to them? You are unique on your own.  No, I am not. I am not unique when I am climbing the ladder with you all. And why? Why can’t I compare myself with them? What do they have that you don’t have? Or I don’t have? They breathe oxygen, walk, talk, eat, sleep, fuck, just like the rest of us. Then what the fuck is the difference between you and them or between them and me? Don’t give yourself any excuse, man. Don’t. There is no difference. It’s just that we have been so comfortable in our boxes, in our little bubbles, that we don’t even aim for greatness. All we look for is the source of our next paycheque and the vacation that will follow after that. Fuck. It’s so fucking annoying. The more you try not to be a part of this herd, the more you end up grazing the grass. “I’ll quit and do that thing which I wanna do after three months, and these three months I will save.” And then these three months become years. The backup we had for ourselves, becomes our life. Risk was a term coined by people who feared failure. Oh that’s risky, let me get a good backup before I jump into that sea. And the waves flow, man. They won’t stop for you. Bye bye. See you on the next shore.

I am fucking done with all of this. But the next moment I would wonder, am I? Am I fucking done with all of this? Am I good enough to go out there and sail on my own? Is this the thing that I want the most that I will ‘risk’ everything? And that’s the thing, man. That’s the thing. Sometimes, I feel like I don’t even know what the fuck I want. I aim for something, then I get it and then that’s not the thing. Then I aim for something else, something small, which I know I’ll get, and I get it. And I reward myself for the success that I knew was always gonna be mine. Because you gotta celebrate your successes right? But was that really a success? It wasn’t. I am just fooling myself. Ah, another outrage on another internet site, let me fill my void with that. Fuck greatness. I can never be great. Let me be the best mediocre there ever was. Best is too much, maybe the second best.

And forty years later, when you will see a guy doing what you could have done, you will tell your kids, hey, make that guy your role model. Not me. You will root for that guy. Your kids will root for that guy. It won’t piss you off anymore. By that time, you will have learned to live with that feeling. You will have lived your whole life like that. You will give your kids a goodnight kiss, think about killing yourself for a passing second and then go to your bed. What happened, your wife will ask. Nothing, it’s a long story, goodnight baby.

Kindle


Graphic Warning: This is very random. May or may not make sense. Read only if you are completely free.

Two years ago, when I saved flight money by not going home on Diwali, I decided to gift myself a little present. Being a Delhiite, buying a shit ton of crackers was my first obvious choice, but since philanthropists and environmentalists were getting laid a lot during those days, I decided not to purchase them. After all, there are just a limited number of ways where one can look up in astonishment and say “Oh God, this is amazing”.

Long story short, neither that happened nor the crackers. “But what should I do with that 10k Air India money I saved?”, I wondered. I remembered something being on sale on Amazon. So, I opened the app and there it was, my long lost lust: Kindle. Prices were slashed from 10k to 8.5k, and the little aunties inside me screamed in joy. My e-reader got delivered a day later. I still remember feeling a bit less hipster for buying it as it was time to say goodbye to the paperback. A few weeks passed, and I was completely immersed in my new gadget. I orgasmed at the feeling of not getting up to turn off the lights after reading the book at night, because Kindle, as you know, has its own backlight. Now in my room, lights were always off. I read books left right and centre. I would take my kindle everywhere, on trains, buses, cabs, while taking a dump and sometimes even while getting laid for being a philanthropist. I remember not missing anything about the paperback, except maybe the fact that reading a bulky one used to develop my bicep for a short span of 0 days.

Yesterday I was at my friend’s housewarming party. Before moving to Bombay, I never understood the concept of house warming parties. I mean you got a house, everyone has a house, what’s the big deal. But now that I understand the herculean job of house hunting in Bombay, I get why people would want to celebrate it. I got a nice place for myself like a year ago and I still keep treating myself and my friends while being in complete awe at this structure of four walls and a roof. Anyway, so as I was making myself comfortable and others uncomfortable by talking about the book that I was reading, a girl randomly stated this opinion as a generalised statement that paperbacks are obviously better than Kindle. I was perplexed, because a) how could she say that coz being a girl aren’t you like interested in environmentalists and all b) how could she be so confident while saying this bizarre thing. So I got into the argument and tried to defend my year old happy relationship with my Kindle. Her arguments varied from how she likes the smell of books to the turning of pages and which makes you realise the progress you are making with the book. Many people agreed with her too. I didn’t understand how some people could turn such a blind eye towards technological advances. I couldn’t fathom how “It can store like over a million books” didn’t occur to any of them while they unanimously agreed on sniffing books like street dogs. What’s in the smell anyway? Is it really that good that you will carry ten books in your luggage while going to a hill station? And if you like the smell so much, maybe just carry one book with you all the time, and read from a kindle. If you start missing the smell, sniff your paperback. I posed all sorts of properly framed rational questions to them like “Are you fucking mad?” “Will this sort of hipster culture ruin our civilisation?” And “why the fuck are you reading news online then, do newspapers smell bad?” to “Will you sleep with me afterwards?”, etc. None of them seemed to leave any impression on them. You can underline an important passage, they would say; you can highlight on kindle, I would promptly reply. In a train, you can know what other people are reading, they would say; nobody wants to know that, I would reply. But the smell is good; fuck your smell. It’s like they had already made up their minds and nothing I could say would ever convince them. Sad thing being, they never tried the Kindle. “This new hipster thing of not using technology will be the end of our civilisation”, I said to myself and went back to my place.

Lying there, on my bed, was my kindle. I looked at it with loving eyes and all sorts of self doubts like “how my nose might not be working as properly as other people’s do” vanished. I opened my Kindle and she asked “Do you wanna read me?” and I pounced on her. Lights were already turned off.

I am gonna write every week now


I am gonna write every week now.  Earlier I used to write whenever I had a good premise, but now I will write every week. Even if the premise is not good. I will write with bad premises. Please don’t read if you don’t want to. But I will write. Every week.

Thanks.

Oh and also did I mention how frequently will I write from now on? Yeah, every week.

I Am Scared Of Feeling Nothing


The whole day I avoided reading anything about the recent rape controversy. The moment I saw or heard the name Asifa, I turned off my TV channel, scrolled through my timeline until a piece of Bollywood gossip appeared, or left conversations with my colleagues midway. Basically, I did everything to avoid it. I knew what happened but I didn’t want to know the details. I was scared. No, not scared of reading the news, but scared of what comments or opinions other people might have about this heinous and brutal crime. I was scared I would punch someone in the face if they tried to justify it by using whataboutery, I was scared of pushing their heads into whatever they were eating till they stopped breathing if they even tried to bring religion as an excuse to justify this, but most of all, I was scared of feeling nothing at all.

What if my blood didn’t boil the way it should? What if I had already given up on anything good our society has to offer and the apathy had overrode my indignation? I am afraid of a day like this. A day when we stop feeling anything, the day when a rape case becomes just another news, the right-left-hindu-muslim-whatabouththis-whataboutthat arguments becomes an obvious part of any coverage, the day when anything we see or feel is politicised to an extent where the suffocation which we feel now becomes the new way of breathing.

It feels like some of us have already given up. How can anyone explain to any of these people that no matter what religion or caste, rape will always be a terrible crime? How do so many of you have the patience to keep writing or voicing your opinions just in the hope that that one guy who defends this heinous activity, has a change of heart? If this act can’t boil that guy’s blood, how are so many of us thinking that our words will? Is there any solution to any of this? I don’t know. Maybe let’s just not read the news. But right now, it feels like I can’t help it. I will let my blood boil for a few hours until something else occurs on my timeline. Sometimes, it’s important to be independent and feel suffocated at the same time. Dear blood, please boil. I haven’t become that weak. Yet.